सातवाहन वंश का संस्थापक और उसका अंतिम शासक कौन था

शिक्षा डेस्क : - सातवाहन वंश:-सातवाहन वंश (60 ई.पू. से 240 ई.) भारत का प्राचीन राजवंश था, जिसने केन्द्रीय दक्षिण भारत पर शासन किया था। भारतीय इतिहास में यह राजवंश 'आन्ध्र वंश' के नाम से भी विख्यात है। सातवाहन वंश का प्रारम्भिक राजा सिमुक था। इस वंश के राजाओं ने विदेशी आक्रमणकारियों से जमकर संघर्ष किया था। इन राजाओं ने शक आक्रांताओं को सहजता से भारत में पैर नहीं जमाने दिये।

सातवाहन वंश, प्राचीन भारत राजवंश है। सातवाहन राजाओं ने 450 वर्षों तक शासन किया। सातवाहन वंश की स्थापना 230 से 60 ईसा पूर्व के बीच राजा सीमुक ने की थी। सातवाहन राजवंंश के सीमुक, शातकर्णी प्रथम, गौतमी पुत्र शातकर्णी, वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी, यज्ञश्री शातकारणी प्रमुख राजा थे।

सातवाहन वंश की स्थापना 230 से 60 ईसा पूर्व के बीच राजा सीमुक ने की थी। सातवाहन राजवंंश के सीमुक, शातकर्णी प्रथम, गौतमी पुत्र शातकर्णी, वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी, यज्ञश्री शातकारणी प्रमुख राजा थे। प्रतिष्ठान सातवाहन वंश की राजधानी रही , यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में है।

सांस्कृतिक और धार्मिक सामाजिक दशा :-सातवाहन साम्राज्य में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी। समाज ब्रह्मण, क्षत्रिय वैश्व, शूद्र में विभक्त था। व्यवसाय के आधार पर अन्य  टी मोटी जातियाँ भी उपस्थित थी। बौद्ध धर्म की उत्पत्ति का समय तथा कर्मकांड की प्रधानता थी। कई यज्ञ अश्वमेघ, राजसूय का चलन था। इंद्र सूर्य चंद्र वासुदेव आदि पूजे जाने वाले देवता थे। स्तूप, बोधिवृक्ष, बुद्ध के चरणचिह्नों, प्रसिद्ध स्थान के साथ ही त्रिशूल, धर्मचक्र, बुद्ध तथा अन्य महात्माओं के अवशेष भी पूजयनीय थे।

सातवाहन काल में आर्थिक पक्ष भी अधिक मजबूत था। किसान भूमि के स्वामी होते थे। तथा कृषि उन्नत तरीके से की जाती थी। सातवाहन प्रशासन में लगभग 70 व्यवसायों का उल्लेख मिलता है।  कुम्भकार, लोहार, चर्मकार, यांत्रिक स्वर्णकार धनिक आदि कई व्यवसायी सातवाहन साम्राज्य में थे। 

सिमुक :- सिमुक (235 ई0पू0 - 212 ई0पू0) सातवाहन वंश का संस्थापक था तथा उसने 235 ई0पू0 से लेकर 212ई0पू0 तक लगभग 23 वर्षों तक शासन किया। यद्यपि उसके विषय में हमें अधिक जानकारी नही मिलती तथापि पुराणों से हमें यह ज्ञात होता है कि कण्व शासकों की शक्ति का नाश कर तथा बचे हुए शुंग मुखियाओं का दमन करके उसने सातवाहन वंश की नींव रखी। पुराणों में उसे सिमेक के अतिरिक्त शिशुक, सिन्धुक तथा शिप्रक आदि नामों से भी पुकारा गया है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार सिमुक ने अपने शासन काल में जैन तथा बौद्ध मन्दिरों का निर्माण करवाया, लेकिन अपने शासन काल के आखिर में वह पथभ्रष्ट तथा क्रुर हो गया जिसके कारण उसे पदच्युत कर उसकी हत्या कर दी गई।

कृष्ण :-सिमुक की मृत्यु के पश्चात उसका छोटा भाई कान्हा (कृष्ण) राजगद्दी पर बैठा। अपने 18 वर्षों के कार्यकाल में कान्हा ने साम्राज्य विसतार की नीति को अपनाया। नासिक के शिलालेख से यह पता चलता है कि कान्हा के समय में सातवाहन साम्राज्य पश्चिम में नासिक तक फैल गया था। शातकर्णी-प् (प्रथम) कान्हा के उपरान्त शातकर्णी प्रथम गद्दी पर बैठा। पुराणों के अनुसार वह कान्हा पुत्र था। परन्तु डॉ. गोपालचारी सिमुक को शातकर्णी प्रथम का पिता मानते हैं। कुछ विद्वानों ने यह माना है कि इसका शासन काल मात्रा दो वर्ष रहा परन्तु नीलकण्ठ शास्त्री ने उसका शासन काल 194 ई.पू. से लेकर 185 ई.पू. माना है। जो भी हो लेकिन यह सुस्पष्ट है कि उसका शासन काल बहुत लम्बा नही था। लेकिन छोटा शासन काल होते हुए भी शातकर्णी प्रथम का कार्यकाल कुछ दृष्टिकोणों से बड़ा महत्वपूर्ण है। सातवाहन शासकों में वह पहला था जिसने इस वंश के शासकों में प्रिय एवं प्रचलित, ‘‘शातकर्णी’’ शब्द से अपना नामकरण किया।

सातकर्णि:- कृष्ण के बाद उसका भतीजा (सिमुक का पुत्र) प्रतिष्ठान के राजसिंहासन पर पदासीन हुआ। उसने सातवाहन राज्य का बहुत विस्तार किया। उसका विवाह नायनिका या नागरिका नाम की कुमारी के साथ हुआ था, जो एक बड़े महारथी सरदार की दुहिता थी। इस विवाह के कारण सातकर्णि की शक्ति बहुत बढ़ गई, क्योंकि एक शक्तिशाली महारथी सरदार की सहायता उसे प्राप्त हो गई। सातकर्णि के सिक्कों पर उसके श्वसुर अंगीयकुलीन महारथी त्रणकयिरो का नाम भी अंकित है। शिलालेखों में उसे 'दक्षिणापथ' और 'अप्रतिहतचक्र' विशेषणों से संभोधित किया गया है। अपने राज्य का विस्तार कर इस प्रतापी राजा ने राजसूय यज्ञ किया, और दो बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया था, क्योंकि सातकर्णी का शासनकाल मौर्य वंश के ह्रास काल में था, अतः स्वाभाविक रूप से उसने अनेक ऐसे प्रदेशों को जीत कर अपने अधीन किया होगा, जो कि पहले मौर्य साम्राज्य के अधीन थे।

अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान इन विजयों के उपलक्ष्य में ही किया गया होगा। सातकर्णी के राज्य में भी प्राचीन वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हो रहा था। इनमें जो दक्षिणा सातकर्णि ने ब्राह्मण पुरोहितों में प्रदान की, उसमें अन्य वस्तुओं के साथ 47,200 गौओं, 10 हाथियों, 1000 घोड़ों, 1 रथ और 68,000 कार्षापणों का भी दान किया गया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सातकर्णी एक प्रबल और शक्ति सम्पन्न राजा था। कलिंगराज खारवेल ने विजय यात्रा करते हुए उसके विरुद्ध शस्त्र नहीं उठाया था, लेकिन हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के अनुसार वह सातकर्णी की उपेक्षा दूर-दूर तक आक्रमण कर सकने में समर्थ हो गया था। सातकर्णी देर तक सातवाहन राज्य का संचालन नहीं कर सका। सम्भवतः एक युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई थी, और उसका शासन काल केवल दस वर्ष (172 से 162 ई. पू. के लगभग) तक रहा था।

गौतमीपुत्र सातकर्णि :- लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी के नेतृत्व में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया। गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी सातवाहन (सेंगर वंश) वंश का सबसे महान शासक था जिसने लगभग 25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया, बल्कि एक विशाल साम्राज्य की भी स्थापना की। गौतमी पुत्र के समय तथा उसकी विजयों के बारें में हमें उसकी माता गौतमी बालश्री के नासिक शिलालेखों से सम्पूर्ण जानकारी मिलती है। उसके सन्दर्भ में हमें इस लेख से यह जानकारी मिलती है कि उसने क्षत्रियों के अहंकार का मान-मर्दन किया था।

इनमें जो दक्षिणा सातकर्णि ने ब्राह्मण पुरोहितों में प्रदान की, उसमें अन्य वस्तुओं के साथ 47,200 गौओं, 10 हाथियों, 1000 घोड़ों, 1 रथ और 68,000 कार्षापणों का भी दान किया गया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सातकर्णी एक प्रबल और शक्ति सम्पन्न राजा था। कलिंगराज खारवेल ने विजय यात्रा करते हुए उसके विरुद्ध शस्त्र नहीं उठाया था, लेकिन हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के अनुसार वह सातकर्णी की उपेक्षा दूर-दूर तक आक्रमण कर सकने में समर्थ हो गया था।

सातकर्णी देर तक सातवाहन राज्य का संचालन नहीं कर सका। सम्भवतः एक युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई थी, और उसका शासन काल केवल दस वर्ष (172 से 162 ई. पू. के लगभग) तक रहा था। अभी उसके पुत्र वयस्क नहीं हुए थे। अतः उसकी मृत्यु के उपरांत रानी नायनिका ने शासन-सूत्र का संचालन किया। पुराणों में सातवाहन राजाओं को आन्ध्र और आन्ध्रभृत्य भी कहा गया है। इसका कारण इन राजाओं का या तो आन्ध्र की जाति का होना है, और या यह भी सम्भव है कि इनके पूर्वज पहले किसी आन्ध्र राजा की सेवा में रहे हों। इनकी शक्ति का केन्द्र आन्ध्र में न होकर महाराष्ट्र के प्रदेश में था।

वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी :- वशिष्ठिपुत्र पलुमवी एक सातवाहन सम्राट बने जो सातवाहन सम्राट गौतमीपुत्र शातकर्णी का पुत्र था। गौतमपुत्र सातकर्णी के बाद वर्ष 132 इसवी में वह शनिवाहन का राजा बना अपने शासनकाल के दौरान, क्षत्रप ने नर्मदा की भूमि उत्तर और उत्तरी कोंकण में ले ली। पुलुमावी और रुद्रदामन (उज्जैन के क्षत्रप) के बीच दो बार युद्ध हुआ। इन दोनों युद्धों में, रूद्रामन ने वशिष्ठिपुत्र पलुमवी को हराया लेकिन उनकी बेटी वस्तीति के बेटे शातकर्णी द्वितीय (पुलुवामी के छोटे भाई) को इसके कारण समझौता किया गया था।

सातवाहन वंश का अंतिम शासक 
सातवाहन वंश का परम प्रतापी और शूरवीर अंतिम शासक यज्ञश्री शातकर्णी था। जिसने शकों पर विजय प्राप्त की थी। तथा संपूर्ण आंध्र प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया था।  किंतु यज्ञश्री शातकर्णी के बाद होने वाले सातवाहन शासक निर्बल और अयोग्य साबित हुए। जिनके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं है।

सातवाहन वंश के अंतिम शासको की दुर्बलता और आयोग्यता का फायदा उठाते हुए पल्लव वंश तथा इक्षवाकु वंश ने दक्षिण भारत पर अधिकार करना शुरू कर दिया तथा सातवाहन वंश सदा के लिए नष्ट हो गया।


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